Friday, 31 July 2015

एक वाकया

एक वाकया,
 मेरी स्कूलिंग एक ऐसे स्कूल से हुई है जहां गाली देना आम बात थी। गाली मतलब ऐसी गालियां सड़कों पर होने वाले झगड़ों में भी नहीं दी जाती होंगी। किशोरावस्था में रचनात्मकता चरम पर रहती है, तो गालियों के साथ भी व्यापक प्रयोग (एक्सपेरिमेंट) किए जाते थे। हालांकि स्कूल प्रशासन भी इस चीज से अच्छी तरह से वाकिफ था और जानबूझकर इसे कभी रोकने की कोशिश नहीं की। लेकिन कुछ अध्यापकों के सामने गाली नहीं दी जा सकती थी। ऐसे ही एक दिन क्लास में एक दुष्ट लड़के के उकसाने पर मेरे मित्र के मुंह से गाली निकल गई जिसे संयोग से क्लास में आते ही अध्यापक ने सुन लिया। गाली देने के लिए उसे लकड़ी की खड़ी स्केल (पटरी) से 50-50 स्केल दोनों हाथों पर मारे गए। उसकी उंगलियां सूज़ कर नीली पड़ गई थीं।

मेरा मित्र बार-बार इस बात का अफसोस कर रहा था, वह क्यों उस दुष्ट लड़के की बातों में आया, उसी के चलते उसे मार पड़ी है। लेकिन मैं कुछ और सोच रहा था, क्या उसकी गाली के लिए सिर्फ उसे ही सजा मिलनी चाहिए थी, उस स्कूल प्रशासन से जुड़ा हर एक इंसान भी उतनी ही सजा का हकदार था, जितना कि मेरा मित्र। 

स्कूल में ऐसा माहौल ही क्यों बनने दिया गया जिसमें छात्रों का गालियां देना और ‘बुलिंग’ आम बात हो। अगर माहौल ही ऐसा बना कर रखा जाए जिसमें अपराधी के पनपने की गुंजाइश हो ऐसे में अपराधी ही दोषी कैसे हुआ? इसके लिए वो भी उतना ही दोषी है, जिसके ऊपर माहौल को बनाने की जिम्मेदारी है... यानी सरकार, प्रशासन, समाज। आत्महत्या के लिए उकसाने वाले को भी सजा का प्रावधान हमारे कानून में है।

-सुलतान अहमद